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बस्ती मंडल में शिक्षा का ‘काला बाजार’: मान्यता प्राइमरी की और दुकान इंटर की, आखिर किसके संरक्षण में पल रहे हैं ये शिक्षा माफिया?

बीएसए दफ्तर की 'मूक सहमति' या बड़ी साझेदारी? बस्ती मंडल में मानकों को ठेंगे पर रखकर धड़ल्ले से चल रहे सैकड़ों फर्जी स्कूल।

अजीत मिश्रा (खोजी)

🏫विशेष खोजी रिपोर्ट: शिक्षा के नाम पर ‘सफेदपोश’ डकैती, क्या कमीशन के खेल में नतमस्तक है बस्ती का शिक्षा विभाग?🏫

  • शिक्षा के नाम पर ‘सफेदपोश डकैती’: कमीशन वाली किताबों और ड्रेस के बोझ तले दब रहा अभिभावक, जिम्मेदार बने मूकदर्शक।
  • बस्ती मंडल के स्कूलों में ‘सुरक्षा शून्य – वसूली नंबर वन’: बिना फायर NOC के चल रहे मौत के अड्डे, क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे अधिकारी?
  • साहब! ये स्कूल हैं या वसूली केंद्र? फर्जी प्रबंधकों की तिजोरियां गरम, जनता के नौनिहालों का भविष्य अधर में।

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

बस्ती/सिद्धार्थनगर/संत कबीर नगर। बस्ती मंडल में शिक्षा का मंदिर अब ‘बाजार’ बन चुका है और इसके सौदागर वो रसूखदार प्रबंधक हैं, जिन्हें शायद जिले के जिम्मेदार अधिकारियों का खुला संरक्षण प्राप्त है। मंडल के तीनों जिलों में फर्जी स्कूलों की बाढ़ आ गई है, जो न केवल अभिभावकों की जेबें कतर रहे हैं, बल्कि नौनिहालों के भविष्य से सरेआम खिलवाड़ कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या बीएसए (BSA) और उनका अमला वाकई अनजान है, या फिर इस ‘अवैध बाजारीकरण’ में उनकी भी बराबर की हिस्सेदारी है?

🏫मान्यता प्राइमरी की, बोर्ड लगा इंटर का!

मंडल में ऐसे दर्जनों स्कूल हैं जिनके पास कागजों में मान्यता केवल कक्षा 1 से 5 या 8 तक की है, लेकिन धरातल पर वहां धड़ल्ले से हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की कक्षाएं संचालित हो रही हैं। ये स्कूल न केवल मानक विहीन हैं, बल्कि बच्चों के भविष्य पर ‘टाइम बम’ की तरह हैं। जब इन बच्चों के रिजल्ट और भविष्य की बात आएगी, तब क्या ये ‘मूकदर्शक’ बने अधिकारी जवाब देंगे?

🏫कमीशनखोरी का ‘आंतरिक बोझ’: लहूलुहान हो रहे अभिभावक

शिक्षा के इन व्यापारिक केंद्रों पर किताबों, ड्रेस, जूते और बेल्ट के नाम पर जो ‘कमीशन का खेल’ चल रहा है, उसने मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर तोड़ दी है।

🔥महंगी प्राइवेट किताबें: NCERT को दरकिनार कर भारी कमीशन वाली प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें थोपी जा रही हैं।

🔥फिक्स्ड दुकानें: स्कूल प्रशासन द्वारा तय दुकानों से ही सामान खरीदने का दबाव बनाया जाता है।

क्या यह जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी नहीं है कि वे इन निजी स्कूलों की मनमानी और कमीशनखोरी पर लगाम कसें?

🔥फायर NOC और सुरक्षा मानक ‘शून्य’, पोस्टर में ‘नंबर वन’

हैरत की बात यह है कि चमक-धमक वाले बैनर-पोस्टर लगाकर खुद को ‘नंबर वन’ बताने वाले इन स्कूलों के पास अग्नि सुरक्षा (Fire NOC) तक नहीं है। मानकों को ताक पर रखकर संकरी गलियों और बिना वेंटिलेशन वाले भवनों में स्कूल चल रहे हैं। क्या अधिकारी किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं?

✍️बड़ा सवाल: कार्यवाही से क्यों कतरा रहे हैं जिम्मेदार?

आखिर क्या वजह है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद भी इन मानक विहीन स्कूलों पर ताला नहीं जड़ा जाता? चर्चा आम है कि इन स्कूलों से ‘महीने का हिस्सा’ सीधे दफ्तरों तक पहुँचता है। अगर ऐसा नहीं है, तो अब तक कितने फर्जी स्कूलों के प्रबंधकों पर FIR हुई और कितने बीएसए दफ्तर के बाबू नपे?

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